shiv puran : shiv puran katha – शिव पुराण की एक छोटी सी कथा पढ़ें हिंदी में

shiv puran: शिव पुराण को मूल रूप से संस्कृत भाषा में लिखा गया है ,शिव पुराण की रचनाकर्ता श्री वेदव्यास जी को बताया जाता है.

शिव पुराण (shiv puran in hindi) में भगवान शिव की असंख्य महिमा का वर्णन किया गया है.

इस पुराण में शिव की महिमा के आलावा इसमें अन्य पूजन विधि अनेकों तरह के ज्ञान और शिक्षाप्रद जैसी बात कथाओं के माध्यम से बताई गई है.

भगवान शिव जो अनंत अनादि स्वयं शम्भु ,सर्वोच्च सत्ता हैं ,विश्व चेतना और सम्पूर्ण ब्रम्हांड रचयिता है तथा इस पुराण में भगवान शिव के विविध रूपों ,अवतारों ,ज्योतिर्लिंगों ,भक्त और भक्ति भाव आदि का वर्णन किया गया है.

शिवपुराण के कुल 24000 श्लोक तथा बारह खंड या भेद हैं जो इस तरह से नीचे दर्शाए गए हैं____

  • विद्येश्वर संहिता
  • रूद्र संहिता
  • विनायक सहिंता
  • उमा सहिंता
  • सहस्त्रकोटिरूद्र सहिंता
  • एकादशरूद्र संहिता
  • कैलाश सहिंता
  • शतरुद्र सहिंता
  • कोटिरुद्र सहिंता
  • मातृ सहिंता
  • वायवीय सहिंता
  • धर्म सहिंता

कथा शिव महिमा का : shiv puran katha

1. देवराज ब्राम्हण की कथा :
एक समय की बात है किरातों के नगर में देवराज नाम का एक ब्राम्हण रहता था. वह ज्ञान में दुर्बल ,गरीब,रस बेचने वाला तथा वैदिक धर्म से विमुख था. वह स्नान-संध्या नहीं करता था ,तथा उसमें वैश्य-वृति बड़ती जा रही थी.

वह भक्तों को बहुत ठगता था. उसने अनेक मनुष्यों को मारकर उन सबका धन हड़प लिया था. उस पापी ने थोड़ा सा धन भी धर्म काम में नहीं लगाया था. वह वेश्यागामी तथा आचार-भ्रष्ट था.

एक दिन वह घूमता हुआ दैवयोग से प्रतिष्ठानपुर (झूसी-प्रयाग) जा पहुंचा. वहां उसने एक शिवालय देखा, जहां बहुत से साधु-महात्मा एकत्र हुए थे. देवराज वहीं ठहर गया. वहां रात में उसे ज्वर आ गया और उसे बड़ी पीड़ा होने लगी.

वहीं पर एक ब्राम्हण देवता शिव पुराण की कथा सुना रहे थे. ज्वर में पड़ा देवराज भी ब्राम्हण के मुख से शिवकथा को निरंतर सुनता रहता था.

एक मास बाद देवराज ज्वर से पीड़ित अवस्था में चल बसा.

यमराज के दूत उसे बांधकर यमपुरी ले गए.

तभी वहां शिवलोक से भगवान शिव के पार्षदगण आ गए. वे कर्पूर के समान उज्जवल थे. उनके हाथों में त्रिशूल,सम्पूर्ण शरीर पर भस्म और गले में रुद्राक्ष की माला उनके शरीर की शोभा बढ़ा रही थी.

उन्होंने यमराज के दूतों को मार-पीटकर देवराज को यमदूतों के चंगुल से छुड़ा लिया और वे उसे अपने अद्भूत विमान में बिठाकर जब कैलाश पर्वत पर ले जाने लगे तो यमपुरी में कोलाहल मच गया.

जिसे सुनकर स्वयं यमराज अपने भवन से बाहर आये. साक्षात रुद्रों के सामान प्रतित होने वाले इन दूतों का धर्मराज ने विधिपूर्वक पूजन कर ज्ञान दृष्टि से सारा मामला जान लिया.

उन्होंने भय के कारण भगवान शिव के दूतों से कोई बात नहीं पूछी. तत्पश्चात देवराज को लेकर कैलाश चले गए और वहां पहुंचकर उन्होंने ब्राम्हण को करुणावतार शिव के हाथों में सौंप दिया.

2. बिंदुग ब्राम्हण की कथा :
बहुत समय की बात है समुद्र के निकटवर्ती प्रदेश में वाष्कल नामक गांव है , जहां वैदिक धर्म से विमुख महापापी मनुष्य रहते हैं. वे सभी दुष्ट हैं एवं उनका मन दूषित विषय भोगों में ही लगा रहता है.

वे देवताओं एवं भाग्य पर विश्वाश नहीं करते.

वे सभी कुटिल वृति वाले हैं ” किसानी करते हैं और विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र रखते हैं. वे व्यभिचारी हैं. वे इस बात से पूर्णतः अंजान हैं कि ज्ञान,वैराग्य तथा सदधर्म ही मनुष्य के लिए विचार रखने वाले , धर्म से विमुख हैं.

वे नित्य कुकर्म में लगे रहते हैं एवं सदा विषयभोगों में डूबे रहते हैं.

वहां की स्त्रियां भी बुरे स्वभाव की , स्वेछाचारिणी,पाप में डूबी,कुटिल सोच वाली और व्यभिचारिणी हैं. वे सभी सदव्यवहार तथा सदाचार से सर्वथा शून्य हैं. वहां सिर्फ दुष्टों का निवास है.

वाष्कल नामक गांव में बिंदुग नाम का एक ब्राम्हण रहता था. वह अधर्मी ,दुरात्मा एवं महापापी था. उसकी स्त्री बहुत सुन्दर थी. उसका नाम चंचुला था. वह सदा ऊतम धर्म का पालन करती थी परन्तु बिदुंग वेश्यागामी था.

इस तरह कुकर्म करते हुए बहुत समय व्तातित हो गया.

उसकी स्त्री काम से पीड़ित होने पर भी स्वधर्मनाश के भय से क्लेश सहकर भी काफी समय तक धर्म भ्रष्ट नहीं हुई. परन्तु आगे चलकर वह भी अपने दुराचारी पति के आचरण से प्रभावित होकर ,दुराचारिणी और अपने धर्म से विमुख हो गई.

इस तरह दुराचार में डूबे हुए उन पति-पत्नी का बहुत सा समय व्यर्थ बीत गया.

वेश्यागामी,दूषित बद्धि वाला वह दुष्ट ब्राम्हण बिंदुग समयानुसार मृत्यु को प्राप्त हो , नरक में चला गया.

बहुत दिनों तक नरक के दुखों को भोगकर वह मूढ़ बुद्धि पापी विंध्यपर्वत पर भयंकर पिशाच हुआ. इधर ,उस दुराचारी बिदुंग के मर जाने पर वह चंचुला नामक स्त्री बहुत समय तक पुत्रों के साथ अपने घर में रहती रही.

पति की मृत्यु के बाद वह भी अपने धर्म से गिरकर पर पुरुषों का संग करने लगी थी. सतियां विपत्ति में भी अपने धर्म का पालन करना नहीं छोड़ती, यही तो तप है, तप कठिन तो होता है ,लेकिन इसका फल मीठा होता है.

विषयी इस सत्य को नहीं जानता इसलिए वह विषयी के विषफल का स्वाद लेते हुए भोग करता है.

एक दिन देवयोग से किसी पुण्य पर्व के आने पर वह अपने भाई-बंधुओं के साथ गोकर्ण क्षेत्र में गई. उसने तीर्थ के जल में स्नान किया एवं बंधुजनों के साथ यत्र-तत्र घुमने लगी.

घूमते-घूमते वह एक देव मंदिर में गई, वहां उसने एक ब्राम्हण के मुख से भगवान शिव की परम पवित्र एवं मंगलकारी कथा सुनी.

कथावाचक ब्राम्हण कह रहे थे कि ” जो स्त्रियां व्यभिचार करती हैं, वे मरने के बाद जब यमलोक जाती है , तब यमराज के दूत उन्हें तरह-तरह से यंत्रणा देते हैं, वे उसके कमांगों को तप्त लौह दंडों से दागते हैं, तप्त लौह के पुरुष से उसका संसर्ग करते हैं.

ये सारे दंड इतनी वेदना देने वाले होते हैं कि जीव पुकार-पुकार कर कहता है अब वह ऐसा नहीं करेगा, लेकिन यमदूत उसे छोड़ते नहीं, कर्मों का फल तो सभी को भोगना पड़ता है, देव,ऋषि,मनुष्य सभी इससे बंधे हुए हैं. ”

ब्राम्हण के मुख से यह वैराग्य बढ़ाने कथा सुनकर चंचुला भय से व्याकुल हो गई.

कथा समाप्त होने पर सभी लोग वहां से चले गए ,

तब कथा बांचने वाले ब्राम्हण देवता से चंचुला ने कहा–” हे ब्राम्हण ! धर्म को न जानने के कारण मेरे द्वारा बहुत बड़ा दुराचार हुआ है. स्वामी ! मेरे ऊपर कृपा कर मेरा उद्धार कीजिए. आपके प्रवचन को सुनकर मुझे इस संसार से वैराग्य हो गया है. मुझ मूढ़ चित्तवाली पापिनी को धिक्कार है.

मैं निंदा के योग्य हूँ, मैं बुरे विषयों में फंसकर अपने धर्म से विमुख हो गई थी, कौन मुझ जैसी कुमार्ग में मन लगाने वाली पापिनी का साथ देगा ? जब यमदूत मेरे गले में फंदा डालकर मुझे बांधकर ले जायेंगे और नरक में मेरे शरीर के टुकड़े करेंगे , तब में कैसे उन महायात्नाओं को सहन कर पाउंगी ?

इसलिए हे ब्राम्हण ! आप मेरे गुरु हैं ,आप ही मेरे माता-पिता हैं, मैं आपकी शरण  में आई हूँ, मुझ अबला का अब आप ही उद्धार कीजिये.

इस प्रकार विलाप करती हुई चंचुला ब्राम्हण देवता के चरणों में गिर पढ़ी.

तब ब्राम्हण ने उसे कृपापूर्वक उठाया.

3. चंचुला की शिव कथा सुनने में रूची और शिवलोक गमन :
ब्राम्हण बोले–” नारी ! तुम सौभाग्यशाली हो, जो भगवान शंकर की कृपा से तुमने वैराग्यपूर्ण शिव पुराण की कथा सुनकर समय से अपनी गलती का एहसास कर लिया है.

तुम डरो मत और भगवान शिव की चरणों में जाओ, उनकी परम कृपा से तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जायेंगे, मैं तुम्हें भगवान शिव की कथा सहित वह मार्ग बताऊंगा जिसके द्वारा तुम्हें सुख देने वाली उत्तम गति प्राप्त होगी.

शिव कथा सुनने से तुम्हारी बुद्धि शुद्ध हो गई है और तम्हें पश्चाताप हुआ है तथा मन में वैराग्य उत्त्पन्न हुआ है.

पश्चाताप ही पाप करने वाले पापियों के लिए सबसे बड़ा प्रायश्चित है, पश्चाताप ही पापों का शोधक है, इससे ही पापों की शुद्धि होती है, सत्पुरुषों के अनुसार ,पापों की शुद्धि के लिए प्रायश्चित,पश्चाताप से ही संपन्न होता है.

जो मनुष्य अपने कुकर्म के लिए पश्चाताप नहीं करता वह उत्तम गति प्राप्त नहीं करता परन्तु जिसे अपने कुकृत्य पर हार्दिक पश्चाताप होता है ,वह अवश्य उत्तम गति का भागीदार होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है.

शिव पुराण की कथा सुनने से चित्त की शुद्धि एवं मन निर्मल हो जाता है, शुद्ध चित्त में ही भगवान शिव व पार्वती का वास होता है, वह शुद्धात्मा पुरुष सदाशिव के पद को प्राप्त होता है, इस कथा का श्रावण सभी मनुष्यों के लिए कल्याणकारी है, अतः इसकी आराधना व सेवा करनी चाहिए.

यह कथा भवबंधनरूपी रोग का नाश करने वाली है, भगवान शिव की कथा सुनकर ह्रदय में उसका मनन करना चाहिए, इससे चित्त की शुद्धि होती है, चित्तशुद्धि होने से ज्ञान और वैराग्य के साथ महेश्वर की भक्ति निश्चय ही प्रकट होती है तथा उनके अनुग्रह से दिव्य मुक्ति प्राप्त होती है.

जो मनुष्य माया के प्रति आसक है, वह इस संसार बंधन से मुक्त नहीं हो पाता.

हे ब्राम्हण पत्नी ! तुम अन्य विषयों से अपने मन को हटाकर भगवान शंकर की इस परम पावन कथा को सुनो–” इससे तुम्हारे चित्त की शुद्धि होगी और तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी. जो मनुष्य निर्मल ह्रदय से भगवान शिव के चरणों का चिंतन करता है, उसकी एक ही जन्म में मुक्ति हो जाती है.

यह कहकर ब्राम्हण चुप हो गए, उनका ह्रदय करुणा से भर गया, वे ध्यान में मग्न हो गए.

ब्राम्हण का उक्त उपदेश सुनकर चंचुला के नेत्रों में आनंद के आंसू छलक आये.

वह हर्ष भरे ह्रदय से ब्राम्हण देवता के चरणों में गिर गई और हाथ जोड़कर कही–” मैं कृतार्थ हो गई | हे ब्राम्हण ! शिवभक्तों में श्रेष्ठ स्वामिन आप धन्य हैं. आप परमार्थदर्शी हैं और सदा परोपकार में लगे रहते हैं. साधों ! मैं नरक के समुद्र में गिर रही हूं, कृपा कर मेरा उद्धार कीजिये.

जिस पैराणिक व अमृत के समान सुन्दर शिव पुराण कथा की बात आपने की है उसे सुनकर ही मेरे मन में वैराग्य उत्त्पन्न हुआ है, उस अमृतमयी शिव पुराण कथा को सुनने के लिए मन में बढ़ी श्रध्दा हो रही है, कृपया आप मुझे उसे सुनाइये. ”

शिव पुराण की कथा सुनने की इच्छा मन में लिए हुए चंचुला उन ब्राम्हण देवता की सेवा में वहीं रहने लगी, उस गोकर्ण नामक महाक्षेत्र में उन ब्राम्हण देवता के मुख से चंचुला शिव पुराण की भक्ति ,ज्ञान और वैराग्य बढ़ाने वाली और मुक्ति देने वाली परम उत्तम कथा सुनकर कृतार्थ हो गई.

उसका चित्त शुद्ध हो गया, वह अपने ह्रदय में शिव के सगुण रूप का चिंतन करने लगी, वह सदैव शिव के सच्चिदानंदमय स्वरूप का स्मरण करती थी, तत्पश्चात,अपना समय पूर्ण होने पर चंचुला ने बिना किसी कष्ट के अपना शरीर त्याग दिया.

उसे लेने के लिए एक दिव्य विमान वहां पहुंचा, वह विमान शोभा-साधनों से सजा था एवं शिव गुणों से सुशोभित था, चंचुला विमान से शिवपुरी पहुंची, उसके सारे पाप धुल गए, वह दिव्यांगना हो गई, वह गौरांगीदेवी मस्तक पर अर्धचंद्र का मुकुट व अन्य दिव्य आभूषण पहने शिवपुरी पहुंची, वहां उसने सनातन देवता त्रिनेत्रधारी महादेव शिव को देखा.

सभी देवता उनकी सेवा में भक्तिभाव से उपस्थित थे, उनकी अंग कांति करोंड़ों सूर्यो के समान प्रकाशित हो रही थी, पांच मुख और हर मुख में तीन-तीन नेत्र थे , मस्तक पर अर्धचंन्द्राकार मुकुट शोभायान हो रहा था. कंठ में नील चिन्ह था, उनके साथ देवी गौरी विराजमान थी, जो विद्युत् पुंज के समान प्रकाशित हो रही थी.

महादेव जी की कीर्ति कपूर के समान गौर थी, उनके शरीर पर श्वेत वस्त्र थे तथा शरीर श्वेत भस्म से युक्त था.

इस प्रकार भगवान शिव के परम उज्जवल रूप के दर्शन कर चंचुला बहुत प्रसन्न हुई, उसने भगवान् को बारंबार प्रणाम किया और हाथ जोड़कर प्रेम,आनंद और संतोष से युक्त हो विनीत भाव से खड़ी हो गई.

उसके नेत्रों से आनंदाश्रुओं की धरा बहने लगी.

भगवानशंकर व भगवती गौरी उमा ने करुणा के साथ सौम्य दृष्टि से देखकर चंचुला को अपने पास बुलाया, गौरी उमा ने उसे प्रेमपूर्वक अपनी सखी बना लिया, चंचुला सुखपूर्वक भगवान शिव के धाम में ,उमा देवी की सखी के रूप में निवास करने लगी.

4.बिंदुग का पिशाच योनी से उद्धार :
एक दिन चंचुला आनंद में मग्न उमा देवी के पास गई और दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगी–” हे गिरिराजनंदिनी ! स्कंदमाता,उमा,आप सभी मनुष्यों एवं देवताओं द्वारा पूज्य तथा समस्त सुखों को दने वाली हैं.

आप शंभुप्रिया हैं, आप ही सगुणा और निर्गुणा हैं, हे सच्चिदानंदरूपिणी ! आप ही प्रकृति की पोषक हैं, हे माता ! आप ही संसार की सृष्टि ,पालन और संहार करने वाली है, आप ही ब्रम्हा , विष्णु,और महेश को उत्तम प्रतिष्ठा देने वाली परम शक्ति हैं.

चंचुला इस प्रकार देवी की स्तुति कर शांत हो गई.

उसकी आँखों में प्रेम के आंसू उमड़ आये. तब शंकरप्रिया भक्तवत्सला उमा देवी ने बड़े प्रेम से चंचुला को चुप कराते हुए कहा–” सखी चंचुला ! मैं तुम्हारी स्तुति से प्रसन्न हूँ | बोलो क्या वर मांगती हो ? ”

चंचुला कहती है–” हे गिरिराज कुमारी ! मेरे पति बिदुंग इस समय कहां हैं ? उनकी कैसी गति हुई है ? मुझे बताइए और कुछ ऐसा उपाय कीजिये ,ताकि हम फिर से मिल सकें, हे महादेवी ! मेरे पति एक शुद्र जाति वैश्या के प्रति आसक्त थे और पाप में ही डूबे रहते थे. ”

गिरिजा बोली–” बेटी ! तुम्हारा पति बिदुंग बड़ा ही पापी था, उसका अंत बड़ा भयानक हुआ. वेश्या का उपभोग करने के कारण वह मूर्ख नरक में अनेक वर्षों तक अनेक प्रकार के दुःख भोगकर अब शेष पाप को भोगने के लिए विंध्यपर्वत पर पिशाच की योनी में रह रहा है. वह दुष्ट वहीं हवा पीकर रहता है और सब प्रकार के कष्ट सहता है.

गौरी देवी की यह बात सुनकर चंचुला अत्यंत दुखी हो गई.

फिर मन को किसी तरह स्थिर करती हुई दुखी ह्रदय से माँ गौरी से उसने एक बार फिर पूछा, हे महादेवी !  मुझ पर कृपा कीजिये और मेरे पापी पति का अब उद्धार कर दीजिये, कृपा करके मुझे वह उपाय बताइए जिससे मेरे पापी पति को उत्तम गति प्राप्त हो सके. ”

गौरी देवी ने कहा–” यदि तुम्हारा पति बिदुंग शिव पुराण की पुण्यमयी ऊतम कथा सुने तो वह इस दुर्गति को पार करके उत्तम गति का भागी हो सकता है.

अमृत के समान मधुर गौरी देवी का यह वचन सुनकर चंचुला ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुकाकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया तथा की कि मेरे पति को शिव पुराण सुनाने की व्यवस्था कीजिये.

ब्राम्हण पत्नी चंचुला के बार-बार प्रार्थना करने पर शिवप्रिया गौरी देवी ने भगवान शिव की महिमा का गान करने वाले गंधर्वराज तुम्बुरों को बुलाकर कहा–” तुम्बुरों ! तुम्हारी भगवान शिव में प्रीति है.

तुम मेरे मन की सभी बातें जानकर मेरे कार्यों को सिद्ध करते हो. तुम मेरी इस सखी के साथ विंध्य पर जाओ, वहां एक महाघोर और भयंकर पिशाच रहता है, पूर्व जन्म में वह पिशाच बिंदुग नामक ब्राम्हण मेरी इस सखी चंचुला का पति था, वह वेश्यागामी हो गया, उसने स्नान-संध्या आदि नित्यकर्म छोड़ दिए.

क्रोध के कारण उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई, दुर्जनों से उसकी मित्रता तथा सज्जनों से द्वेष बढ़ गया था. वह अस्त्र-शस्त्र से हिंसा करता,लोगों को सताता और उनके घरों में आग लगा देता था. चांडालों से दोस्ती करता व रोज वेश्या के पास जाता था. पत्नी को त्यागकर दुष्ट लोगों से मित्रता कर उन्हीं के संपर्क में रहता था. वह मृत्यु तक दुराचार में फंसा रहा.

मृत्यु के बाद उसे पापियों के भोग स्थान यमपुर ले जाया गया. वहां घोर नरकों को सहकर इस समय वह विंध्य पर्वत पर पिशाच बनकर रह रहा है और पापों का फल भोग रहा है.

तुम उसके सामने परम पुण्यमयी पापों का नाश करने वाली शिव पुराण की दिव्य कथा का प्रवचन करो, इस कथा को सुनने से उसका ह्रदय सभी पापों से मुक्त होकर शुद्ध हो जाएगा, और वह प्रेत योनि से मुक्त हो जाएगा, दुर्गति से मुक्त होने पर उस बिंदुग नामक पिशाच को विमान पर बिठाकर तुम भगवानशिव के पास ले आना.

गौरी मां का आदेश पाकर गंधर्वराज तुम्बुरों प्रसन्नतापूर्वक अपने भाग्य की सराहना करते हुए चंचुला को साथ लेकर विमान से पिशाच के निवास स्थान विंध्यपर्वत गया.

वहां पहुंचकर उसने उस विकराल आकृति वाले पिशाच को देखा, उसका शरीर विशाल था, उसकी ठोढ़ी बढ़ी थी, वह कभी हंसता . कभी रोता और कभी उछलता था.

महाबली तुम्बुरों ने बिदुंग नामक पिशाच को पाशों से बांध लिया, उसके पाश्चात तुम्बुरों ने शिव पुराण की कथा बांचने के लिए स्थान तलाश कर मंडप की रचना की.

शीघ्र ही इस बात का पता लोगों को चल गया कि एक पिशाच के उद्धार हेतु देवी पार्वती की आज्ञा से तुम्बुरों शिव पुराण की अमृत कथा सुनाने विंध्यपर्वत पर आया है.
उस कथा को सुनने के लोभ से बहुत से देवर्षि वहां पहुँच गए.

सभी को आदरपूर्वक स्थान दिया गया. पिशाच बिंदुग को पाशों में बंधकर आसन पर बिठाया गया और तब तुन्बुरों ने परम उत्तम शिव पुराण की अमृत कथा का गान शुरू किया. उसने पहली विद्येश्वर सहिंता से लेकर सातवीं वायुसंहिता तक शिव पुराण की कथा का स्पष्ट वर्णन किया.

सातों संहिताओं सहित शिव पुराण को सुनकर सभी श्रोता कृतार्थ हो गए. परम पुण्यम शिव पुराण को सुनकर पिशाच सभी पापों से मुक्त हो गया और उसने पिशाच शरीर का त्याग कर दिया.

शीघ्र ही उसका रूप दिव्य हो गया, उसका शरीरगौर वर्ण का हो गया, शरीर पर श्वेत वस्त्र एवं पुरुषों के आभूषण आ गए.

इस प्रकार दिव्य देहधारी होकर बिदुंग अपनी पत्नी चंचुला के साथ स्वयं भी भगवान शिव का गुणगान करने लगा.

उसे इस दिव्य रूप में देखकर सभी को बहुत आश्चचर्य हुआ, उसका मन परम आनंद से परिपूर्ण हो गया, सभी भगवान महेश्वर के अद्भूत चरित्र को सुनकर कृतार्थ हो, उनका यशोगान करते हुए अपने-अपने धाम को चले गए.

बिंदुग अपनी पत्नी चंचुला के साथ विमान में बैठकर शिवपुरी की ओर चल दिया.

महेश्वर के गुणों का गान करता हुआ बिंदुग अपनी पत्नी चंचुला व तुम्बुरों के साथ शीघ्र ही शिवधाम पहुंच गया.

भगवान शिव व देवी पार्वती ने उसे अपना पार्षद बना लिया.

दोनों पति-पत्नी सुखपूर्वक भगवान महेश्वर एवं देवी गौरी के चरणों में अविचल निवास पाकर धन्य हो गए.

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